जेडीए की आंखों पर काली पट्टी

‘लोग टूट जाते है एक घर बनाने में उन्हें शर्म नहीं आती बस्तियां गिराने में’ किसी शायर की यह पंक्तियां जयपुर विकास प्राधिकरण पर इस वक्त बिल्कुल सटीक बैठती है, जी हाँ! टोंक रोड स्थित कैलाशपुरी में खण्डाना हॉस्पिटल और अन्य अवैध निर्माणों के पीछे जेडीए हाथ धोकर पीदे पढ़ गया है, कानूनन तो यह बिल्कुल ठीक है और हमारे शहर को सुव्यवस्थित और सुविधाजनक बनाने के लिये बेहद जरूरी भी, लेकिन जेडीए को यह कदम निर्माण शुरू होने के पहले उठा लेने चाहिये क्योंकि अब जेडीए की तोड़ाफोड़ी ब्रांच की टीम पीले पंजों के साथ अवैध निर्माणों को नेस्तानाबूद करने के लिये पहुँचती है तब तक यह निर्माण सत्तर से सौ प्रतिशत बनकर खड़े हो चुके होते है बल्कि वर्षों तक बने खड़े रहते है, लेकिन अचानक जेडीए नींद से हड़बड़ा कर जागता है और अवैध निर्माण तोड़ दिये जाते है और यह तब तोड़े जाते हैं जब इनमें काफी ज्यादा पूँजी निवेश के साथ हजारों श्रमिकों का खून-पसीना लग चुका होता है, यह सीधे-सीधे हमारे राष्ट्र का महानुकसान और जनता के साथ किया गया धोखा है। एक तरह से जेडीए की गलतियों का खामियाजा शहर की आवाम भुगत रही है।

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हैरानी तो यहाँ तब होती है तब जेडीए का विशाल बजट और अवैध निर्माण को रोकने की जिम्मेदारी में लगे मोटी तनख्वाह वाले अधिकारी कर्मचारियों की लम्बी-चौड़ी मौज को भी समय रहते यह अवैध निर्माण नजर नहीं आते। जेडीए अगर समय रहते अवैध निर्माण को रोक दे तो राष्ट्र का काफी नुकसान बच सकता है। अपनी तमाम जिन्दगी की कमायी हुयी पूँजी और यहाँ तक की कर्जा लेकर भी बनाये जा रहे अपने आशियानों-शौरूमों को लोग ध्वस्त होते देखते हैं तो उनका तंत्रिका तंत्र पूरा हिल जाता है। ऐसे कई पीडि़तों को आपातकालीन उपचार भी देना पड़ जाता है यह घटना किसी अहखबार की खबर नहीं बन पाती, सिर्फ अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने की खबरे ही प्रकाशित हो जाती है। नींव खुदने से लेकर दो-दो छते तब डाल दी जाती है मगर लम्बी-चौड़ी फौज को यह सब कुछ नजर नहीं आता। जयपुर की आवाम एकदम शीशे की तरह साफ यह सारा खेल देख और समझ रही है लेकिन भ्रष्टाचार की मोटी काली पट्टी आँखों पर चढ़ी होने से अधिकारियों को समय पर यह अवैध निर्माण नजर नहीं आते और आमजन और राष्ट्र का नुकसान जारी है।

करोड़ों खर्च फिर भी बदहाली का आलमजयपुर विकास प्राधिकरण में हो रही लापरवाहियों के कारण सरकारी राजस्व को भारी चोट पहुँच रही है और लापरवाहियों की इसी फेहरिस्त में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम भी है जिन्हें जेडीए बना कर भूल चुका है। आमजन को पानी बचाने का पाठ पढ़ाने वाले और वर्षा जल पुनर्भरण में करोड़ों रुपये व्यय होने के बाद भी यह ज्यादातर स्ट्रक्चर पूरी तरह असफल है।

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शहर में करीब 193 वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाए है जेडीए के प्रमुख पार्क, कम्प्यूनिटी सेन्टर, रामबाग, अम्बेडकर सर्किल, सरदार पटेल मार्ग, प्रमुख पर्यटन स्थल, अम्बाबाड़ी, प्रमुख सरकारी इमारतों के अलावा कई जगहों ये स्ट्रक्चर बनाए गए। जेडीए अधिकारियों की माने तो सालाना मेंटनेंस का काम निजी फर्म को दिया जा चुका है, लेकिन बारिश शुरू होने तक काफी स्ट्रक्चर साफ-सफाई की बाह जोट रहे है।

मेट्रो ट्रैक के पास : मेट्रो ट्रैक व बीआरटीएस कॉरिडोर में वर्षा से एकत्र होने वाले पानी को सहेजने के लिए करीब 210 वर्षा जल पुनर्भरण संरचना बनाने की योजना थी। इसके तहत 50-50 स्ट्रक्चर तैयार भी कराए गए। इसके बाद जेडीए ने इसे फिजूलखर्ची मानते हुए मानसरोवर से आ रहे मेट्रो ट्रैक के नीचे वर्षा जल पुर्नभरण संरचना बनाने की बजाए सौन्दर्यन व पेड़ पौधे लगा दिए। इन स्ट्रक्चरों में से कईयों की दुर्दशा आसानी से देखी जा सकती है।

जलदाय विभाग : शहर में 2011 में सभी जलदाय दफ्तरों में वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाए गए और कम्पनी को पांच साल तक मेंटीनेंस का जिम्मा सौंपा गया। लेकिन सच ये है कि इनकी खैर खबर नहीं ली गई है। ज्योति नगर में सिस्टम को पूरी तरह पक्के फर्श से पैक कर दिया गया। हर जगह हालात जर्जर है। न तो कभी अभियंताओं ने इसकी चिंता की और न ही सेवा प्रदाता कम्पनियों ने। शहर के अभियंताओं को यह तक पता नहीं है कि कितने स्ट्रक्चर बने हुए है।

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