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खतरनाक है शहर में बढ़ रही आत्महत्यायें

केस – 1

राजधानी जयपुर में गत दिनों एक छात्रा ने फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। एम मिलनसार और हंसमुख स्वाभाव वाली इस छात्रा की मौत से सभी हैरान थे कि एक होनहार लड़की ने आखिर ऐसा खतरनाक कदम क्यों उठा लिया। इस छात्रा ने अपने सुसाइड नोट में देहदान और आँसू नहीं बाहने की बात भी लिख छोड़ी थी।

केस – 2

ऐसे ही विश्वकर्मा क्षेत्र में एक महिला ने पति से मामूली कहासूनी पर ही अपनी दो मासूम बेटियों को जहर खिला कर स्वयं भी जहर खाकर आत्महत्या कर ली।

उफ! एक शान्तिप्रिय और खुशहाल शहर वाली आवाम के बीच ऐसे दर्दनाक आत्महत्याओं के हादसे बहुत तकलीफ देह लगते है। गत कुछ वर्षां से राजधानी जयपुर में आत्महत्याओं में निरन्तरता बनी हुयी है। जब की कुछ वर्ष पूर्व तक यह एग्जाम, रिजल्ट और विवाहों के समय ही पढऩे-सुनने को मिला करते थे तब तो जयपुर के कुछ खास स्थलों पर पुलिस को अपनी गश्त तक बढ़ानी पड़ती थी खासकर आमेर का मावठा, सागर, गलता कुण्ड, बाईस गोदाम स्थित रेल की पटरियां और गोविन्द देव जी मन्दिर के पीछे स्थित राजामल का तालाब क्षेत्र में। लेकिन अब इनके वर्ष भर बने रहने से पुलिस की यह व्यवस्था भी यहां निरन्तर नहीं रह पायी। गुलाबी नगर में बढ़ रहे आत्महत्याओं के हादसों ने समाज को भी चिन्तित कर दिया है क्योंकि आत्महत्या एक अकेले परिवार को नहीं बल्कि एक समाज को प्रभावित करती है। परीक्षा का व्यापार में असफलता, पारिवारिक कलह, लाईलाज बीमारी, कांई असहनीय घटना, बड़ा आर्थिक नुकसान या कर्जा जैसी स्थितियां खासकर कमजोर सहनशक्ति वालों को आत्महत्या की तरफ धकेलती है। जयपुर में आत्महत्याओं के मामले बढ़ते देखकर लग रहा है और अपनी मौत भी अबवह स्वयं मुकर्रर करने लगे हैं। परिवार उच्च हो या माध्यम या फिर निम्न सभी मेंं ऐसे हादसे बढ़ रहे हैं। उम्र की भी इसमें कोई सीमा नहीं हैं।

राजधानी जयपुर में आत्महत्याओं के कई हृदय विदारक हादसे भी हुये है। कुछ वर्ष पूर्व चांदपोल गेट के बाहर स्थित एक होटल के कमरे में खासकर चार लाशें बरामद हुयी थी जिसमें एक दम्पत्ति ने पहले अपने दो मासूम पुत्रों की गला घोटकर हत्या की और फिर अपनी भी जीवन लीला फन्दा लगाकर समाप्त कर ली। यह हादस भी आमजन के दिलो-दिमाग पर कई दिनों तक छाया रहा अभी तो आत्महत्याओं के कई मामले पुलिस तक पहुंच ही नहीं पाते क्योंकि समाज में बदनामी के भय से कई परिवार आत्महत्याओं को आकस्मिक मौत बता कर अंति संस्कार कर देते है। खासकर जहर खाने या फांसी लगाने के मामलों में लोग अपने पारिवारिक चिकित्सक से ही जांच करवाकर सीधा अंतिम क्रियाकर्म कर देते है क्योंकि पुलिस जांच और पोस्टमार्टम से उधेड़ कर विकृत किये गये शरीर परिवार की सामाजिक प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचाते है।

अब मोबाइल फोन आने के बाद तो कई मामलों में आत्महत्या करने वाला अपने अंतिम समय तक परिजनों, मित्रों या रिश्तेदारों से बखूबी करता है। मालवीय नगर में रेल की पटरियों वालों से बात की और चालू मोबाइल में ही वह एक चीख के साथ मालगाड़ी के आगे कूद गया वह चीख आज तक परिवारजनों के कानों में गूंज रही है। सवाई मानसिंह अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. आई.डी. गुप्ता का शहर में बढ़ती आत्महत्याओं के बारे में कहना है कि कोई भी व्यक्ति आत्महत्या की तरफ तब कदम उठाता है जब वह अन्दर से अपनी असफलतायें और निराशा के चलते टूट चुका होता है। ऐसे माहौल से कोई मामूली सी घटना भी घटित होते ही वह आत्महत्या के विचार को फलीभूत कर डालता है। डॉ. गुप्ता के मुताबिक इस तरह से पीडि़त लोगों में खास तरह के लक्षण पहले ही उभर आते हैं नींद ना आना, मन उदास रहना, एकाग्रता में कमी, किसी से मिलने में भी जी चुराना, अपने आपको दोषी मानना, भूख कम या बहुत ज्यादा लगना जैसे लक्षण आत्महत्या करने से पूर्व ही नजर आने लगते है। ऐसी स्थिति पर परिवारजनों को नजर रखनी चाहिये और उसे समझाइश या फिर मनोचिकित्सक को दिखाकर उपचार कर लेना बेहतर रहता हैं।



Feature Post by Dr. ID Gupta

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