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क्यों जरूरी है खेल ?

कभी भी हार को दिल पर मत ले, हार से सीख ले क्योंकि कभी-कभी एक अच्छा खिलाड़ी भी “शून्य” पर आउट हो जाता हैं

खेल स्कूलों में शिक्षा का एक अभिन्न अंग होना चाहिए, तभी बच्चे स्वस्थ और मजबूर होंगे बहुत ही ज़रूरी है बच्चों को खेल से जोड़ना खेल के प्रति निष्ठा, ईमानदारी, परिश्रम और आत्मविश्वास ही किसी खिलाड़ी को महान खिलाड़ी बनाते हैं

आज बच्चे घर के अंदर खेलने जाने वाले खेलों को पसंद करते हैं और अभिभावक भी इसे सुरक्षित मानते हैं, इन्हीं कारणों से वृद्धावस्था में होने वाली डायबिटीज़, अर्थराइटिस, दिल के रोग, अवसाद जैसी बीमारियां कम उम्र में भी फैल रही हैं।

जीवनशैली में आये बदलाव के कारण लोगों में बीमारियां बढ़ती जा रही हैं और बढ़ती उम्र के साथ फिटनेस बरकरार रखना आसान नहीं। लेकिन आपका पसंदीदा खेल आपको आजीवन फिट रखने में भी आपकी मदद करते हैं। खेलों में जीतने या हारने से ज्‍़यादा महत्व रखता है मनोरंजन।

चाहे आप ग्रुप में खेल खेलें जैसे क्रिकेट या फुटबॉल या आप अकेले खेलें (तैराकी, साइकलिंग) हर तरह के खेल खेलते समय आपके शरीर में ऐसा हॉरमोन बनता है जिसे एंडोर्फीन कहते हैं। ये हॉरमोन हमारे दिमाग और मन को खुशी का एहसास दिलाता है। इसलिए खेलने के बाद हमारा मूड खुशनुमा हो जाता है और चिंता या तनाव दूर हो जाती है।

खेल में तो हार-जीत चलती रहती है। जब आप किसी खेल या मुक़ाबले में हार जाते हैं तो आपको अपनी कमियों का पता चलता है। आपको ये बात समझ आती है की हारना भी जीवन का एक हिस्सा है। हार जाने से जीवन समाप्त नहीं हो जाता बल्कि आपको अपने को सुधारने का एक और मौका मिलता है। जब हमारी सोच सकारात्मक हो जाती है तो हम असफलता से निराश नहीं होते हैं और तनाव और अवसाद से दूर रहते हैं।

हमें बच्चों को खेलों के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए और घर तथा स्कूली स्तर पर शिक्षकों और अभिभावकों की समान भागीदारी के द्वारा उनकी खेलों में रुचि का निर्माण करना चाहिए। आज के समय में खेल बहुत ही रुचिकर हो गए हैं और किसी के भी द्वारा किसी भी समय खेले जा सकते हैं हालांकि, पढ़ाई तथा अन्य लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इनका बचपन से ही अभ्यास होना चाहिए।

आदित्य शर्मा ( पूर्व बास्केटबॉल कप्तान )

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