फिर भी फ़र्ज़ निभाती है पुलिस | Shabashh Police

पुलिस जिसके कन्धों पर देश की आन्तरिक सुरक्षा की अहम जिम्मेदारी है और वह आज उसके पास मौजूद संसाधनों के बलबूते उसे किसी तरह उठा भी रही है। चौबीस घण्टे और तीन सौ पैंसठ दिन बिना रूके और बिना थके वह अपराध और अपराधियों से भिड़ भी रही है। अपराधों के साथ पुलिस को समाज और भी कई कार्य सौंप देता है घर-दुकान में चाहे सा¡प घुस गया हो या नलों में पानी नहीं आने का झंझट हो, यह सब पुलिस को ही सुलटाने पड़ते है।

 

पुलिस आज समाज की जरूरत है बगैर पुलिस के समाज में सुख-शांति नहीं रह सकती पुलिस ने आज समाज को एक तरह से सुरक्षा घेरा दिया हुआ है। यही वजह है कि गत वर्ष एक मुस्लिम विधायक ने एक भीड़भरी जन सभा में कह दिया था कि पन्द्रह मिनट के लिये पुलिस को किनारे कर दो हम पूरे समाज को घूल चटा देगें, इससे अंदाजा लगता है कि पुलिस आज समाज के लिये कितनी जरूरी है। इन सबके बावजूद आज समाज में पुलिस का नाम सुनकर हर कोई चौंक उठता है और अगर कोई पुलिसकर्मी किसी के घर, दुकान या कार्यालय में आ जायें तो पास-पडौस भी सतर्क हो उठता है कि आखिर वह यहां क्यों आया ? समाज की सुरक्षा के लिये गठित किये गये पुलिस बल के प्रति आमजन की यह भयभीत और नकारात्मक सोच का आजादी के इतने वर्षों बाद भी बने रहना चिन्ता का विषय हैं।

 

आमजन के जान-माल की हिफाजत करने की बड़ी जिम्मेदारी आज पुलिस के कंधों पर ही है और अपनी इस जिम्मेदारी को निभाने के कÙार्व्य निर्वहन के समय अक्सर पुलिस कर्मी घायल और शहीद तक हो जाते हैं फिर भी पुलिस की नकारात्मक छवि का समाज में बने रहना अजीब लगता हैं, हालांकि पुलिस की कई बार बड़ी गलतिया¡ उजागर होती रहती है लेकिन उन मुट्ठीभर गलतिया¡ के लिये पूरे पुलिस बल को दोषी ठहराना उचित नहीं है। आतंकवादियों, खतरनाक अपराधियों और कम खतरनाक अपराधियों सभी से सीधी भिडंत करने वाली हमारी यही पुलिस उन्हंे किसी तरह कटघरों तक बामुश्किल पहुंचाती है। यही नहीं दंगा-फसाद, क¶र्य, सड़क और रेल हादसे के समय भी यही पुलिस सर्वप्रथम पहु¡चकर खराब -िस्थतियों को संभालती है सामने से हो रहे पथराव के समय भी बेंत वाली ढ़ला देकर उन्हें उपद्रवी भीड़ को खदेड़ने की ड्यूटी को जान-जोखिम में ड़ला का पूरा करना पड़ता है। अपराधियों को पकड़ने के समय भी उन्हें कई खतरनाक -िस्थतियों का सामना करना पड़ जाता है। अपनी जान और परिवार की परवाह किये बगैर यह सिर्फ, अपराधियों को दबोचने के लिये उनसे दो-दो हाथ कर लेते हैं। सरकार और आवाम के बीच आज एक सबसे महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य कर रही पुलिस पर हर सरकार अपना दबाव और प्रभाव बनायें रखती है। पुलिस बल में आज जो कर्मचारी आमजन के सबसे ज्यादा निकट है और सभी तरह की -िस्थतियों का सामना सड़क पर सबसे पहले जो करता है वह पुलिस कांस्टेबल है। पुलिस विभाग में भले ही इन्हें एक छोटे पद पर माना जाता है परन्तु आज वह जिस तरह की परि-िस्थतियों में अपनी तमाम जिम्मेदारियों को जान जोखिम में डालकर भी निभाता चला जा रहा है उतना शायद ही किसी अन्य विभाग का कर्मचारी निभा रहा होगा।

 

क¶यूर् जैसी -िस्थतियों में तो यह घायल होने पर मरहम पट्टी करवा कर तुरन्त ड्यूटी पर हाजिर भी हो जाते हैं। अगर थाने में कोई अपराधी घायल हो जाता है या चल बसता है तो पूरे थाने पर कहर टूट पड़ता है भले ही अपराधी पहले से बीमार हो या स्वयं अपने आपको घायल कर लिया हो तब भी खप्पर तो पुलिस के सिर पर ही फोड़ा जाता है। पुराने संसाधनों के बूते आज के अत्याधुनिक संचार सुविधाओं और हथियारों से लैंस अपराधियों से हमारी पुलिस के यह जवान अपने पारम्परिक हथियारों के बल पर ही उनसे लोहा ले रहे है। रेल की पटरियों, सड़कों, जंगलों में होने वाली मानव अथवा मवेशियों की मौत के बाद सड़ी-गली लाशें हटाने की जिम्मेदारी भी यह जवान उठाते हैं। जिन्हें देख कर आमजन अपना रास्ता तक बदल लेते हैं यह उन्हीं का पंचनामा और लावारिस होने की -िस्थति में अन्तिम संस्कार तक का फर्ज निभाते है। पुलिस कांस्टेबलों की ड्यूटी वैसे तो तयशुदा होती है लेकिन शोभायात्राओं वी.आई.पी. मूवमेंट, जलूस के आगमन पर इन्हें थाने आते ही फिर ड्यूटी पर भेज दिया जाता है। किसी भी तरह का तीज-त्यौहार हो वह इन्हें परिवार सहित कभी-कभार ही किस्मत से मना पाते हैं।

 

आमजन इन त्यौहारों को खुशी और उल्लास से मनाये इसलिए इनकी छुटि्टया¡ त्यौहारों के मौकांे पर रí कर दी जाती है। कुछ पुलिस कांस्टेबलों ने बातचीत में बताया कि उन्हें अपने विभाग से तो कोई खास शिकायत नहीं है लेकिन आमजन का रूखा व्यवहार ही उन्हें ज्यादा दु:खी करता है, हमारी गलती पर तो वह नाराजगी प्रकट करते हैं लेकिन हमारी किसी सफलता के बाद तो कहते है क्या हुआ ? यह तो आखिर उनका फर्ज ही था इसी बाबत ही तो यह सरकार से वेतन उठाते हैं।

 

अब समाज को पुलिस के प्रति अपनी सोच बदलने की जरूरत है बगैर हड़ताल या धरना प्रदर्शन किये बगैर यह पुलिस जिन परि-िस्थतियों में आज अपने फर्ज को निभा रही है। वह तारीफ के काबिल है। देश की खातिर सीमाओं पर शहीद होने वाले सेना के जवानों पर देश गर्व करता है और शहीद जवान के शहर-गा¡व में पूरे सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया जाता है लेकिन आमजन की खातिर बलिदान देने वाले पुलिसकर्मी को सादा ढंग से श्रदाजंलि देकर भूला दिया जाता है। यह -िस्थतिया¡ बदल कर आज समाज में पुलिस को सम्मान देने की बेहद जरूरत हैं।

arvind bhutani

– Arvind Bhutani

Leave a Reply